Friday, March 20, 2015

NATIONAL ALLIANCE OF PEOPLE'S MOVEMENTS demands debate on Land Acquisition

नितिन गडकरीजी, भूमि अधिग्रहण व किसानी पर ज़रूर ज़ाहिर बहस करें...
·        जन आन्दोलनों के हम साथी तैयार हैं |

केंद्र सरकार की ओर से नितिन गड्करीजी ने ‘भू-अधिग्रहण कानून, 2013’ में संशोधन के लिए लाये अध्यादेश को विधेयक में तब्दील करने के बाद अभी तक, जनाक्रोश के सामने कुछ झुकाव बताते हुए फिर कुछ बदलाव लोक-सभा में पेश किये | लेकिन इनमें न कोई दम है और न कोई तथ्य | प्रधानमंत्री मोदीजी के नेतृत्व में पर्यावरण से लेकर रक्षा मंत्रालय तक के कई बयान झूठे या खोखले साबित होते आये है, उसी का यह एक और नमूना है | संशोधन के मुद्दों से अध्यादेश और विधेयक के मसौदे पर 2013 कानून में जो किसान विरोधी बदलाव लाये गए हैं, उन पर कोई असर नहीं है | 13 नए कानूनों को 2013 के कानून के दायरे में लेने का दावा है | लेकिन 2013 के कानून से अब मूल किसानों के पक्ष में रखे गए प्रावधानों को बाहर क्यों किया गया, इसपर मोदी सरकार चुप हो | इसलिए भाजपा की नयी सरकार किसानों से धोखा-धड़ी ज़ाहिर है |

     देश-भर के किसान संगठन और आन्दोलन जबकि अपनी बुलंद आवाज़ जगह-जगह उठा रहे हैं और रास्ते पर उतर आयें है तब कई सारे विरोधी दल भी किसानों के पक्ष में खड़े हुए हैं | लोक-सभा में बहुमत के जोर पर भाजपा के अन्दर हो रहे सवालों को भी दबा कर विधेयक को मंज़ूर करवाया गया है तो भी ना केवल ‘राज्य-सभा’ में पर देश की अधिकांश ग्राम-सभाओं का तो इसे सख्त विरोध है, यह बात ज़ाहिर है |

     इस परिप्रेक्ष में कांग्रेस भी रास्ते पर उतर आई तो भाजपा के वर्त्तमान परिवहन मंत्री तथा भूतपूर्व ग्रामीण विकास मंत्री एवं अध्यादेश के रचनाकर्ता श्री नितिन गडकरी ने सोनिया गांधी और अन्ना हजारे जी को ज़ाहिर बहस की चुनौती दी है | यह न्योता इन दो व्यक्तियों को ही क्यों? इसके कुछ कारण तो हमें ज्ञात हैं ! इसलिए हम ज़ाहिर रूप से गडकरी जी से कहना चाहते हैं की सही, गंभीर और गहरी बहस, अध्यादेश/विधेयक, 2013 कानून और किसानी के मुद्दों पर करनी है तो आइये, हम जनआन्दोलनों के साथी तैयार है | आप तैयार हों तो आने वाले सप्ताह भर में सुविधाजनक दिन तय करके, हम स्थल सुनिश्चित करें |

     आप इस निमंत्रण को ना टालते हुए सकारात्मक प्रतिसाद देंगे, तो यह केवल चुनौती न रह कर एक सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर राष्ट्रीय बहस बनेगी, जिससे हो सकता है, इस देश के वंचित, शोषित, विस्थापित किसान-मजदूरों को ‘भूमि’ और सम्बंधित समस्याओं पर राहत मिल पायेगी | इससे न केवल देश, समाज का प्रबोधन होगा किन्तु अधिक विचारशील भूमिका लेने के लिए देश के श्रमजीवी एवं बुद्धिजीवी तैयार हो पाएंगे |

जवाब की अपेक्षा करते हैं |

मेधा पाटकर
और जनआन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय के साथी 

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