Javed Anand: Bhagwat ka Bharat; Mahesh Rathi: इण्डिया से खफा संघी भारतवंशियों की व्यथा कथा !

"Jisne bharat se naata toda uska yeh hotahai" 

Mohan Bhagwat: what he actually said on the Bharatiya tradition

Foeticide, infant mortality among girls, dowry deaths, khaps, honour killings. Which of these values, Bhagwat Ji, have we imported from the West? Javed Anand

भागवत कोशिशों के बारे में यही कहा जा सकता है। जय हो अपराधी हितरक्षक, जय हो बलात्कारी ध्वजधारक तेरी जय हो।- Mahesh Rathi

Respected Bhagwat Ji,
First you said that rapes and gangrapes happen in India, not Bharat, because the former has embraced Western ideas and abandoned Indian values. You’ve spoken again now, to put women in their proper place: serving their husbands in their marital homes. Some people think you’ve put your foot (make it plural) in your mouth. But I say, right on, keep talking. Young India, the middle class especially, is listening. And I am sure you’ll be hearing from them soon.

Meanwhile, permit me to point out that your views are pretty close to many voices from the Muslim world: from the Taliban in Pakistan to the Wahhabis of Saudi Arabia. Perhaps it’s time votaries of Hindutva and champions of Islamic fundamentalism came together in a new coalition of the culturally constipated: “Us vs the West”. While you give some thought to my humble suggestion, Bhagwat Ji, I confess that my desh bhakti, fidelity to “our values”, keeps hitting the wall of some inconvenient facts. To begin with, what does one say to Swami Agnivesh when he claims that upper caste Hindus are the biggest mass murderers (“terrorists” is the word he once used) on earth because they annihilate the female foetus in millions every year? How does one explain this unholy fusion of Western technology with Indian values? Thanks to this ongoing slaughter, our Bharatvarsh is now among the very few countries in the world with a sex ratio highly skewed against women.

Let’s take the example of Gujarat. Bhagwat Ji, your “laboratory of Hindutva” is amongst the worst offenders in this respect. According to the 2001 census, there were only 883 girls per 1,000 boys in the state in the 0-6 age group. In the electoral list of first-time voters for the 2012 Assembly polls, there were only 601 girls per 1,000 boys. Does the plight of the Bhartiya kanya or nari ever figure in your meetings with Narendra Modi Ji?

Here’s a checklist: Foeticide, infanticide, higher infant mortality among girls, rampant discrimination against the girl child, dowry deaths, khap panchayats, “honour” killings. Which of these values, Bhagwat Ji, have we imported from the West? The Oxford Hindi-English dictionary defines “pati” as husband, master, lord, one who controls… Is this a Western denigration, corruption of the word? Or is this how it really is: the husband as owner (pati) of his wife, something similar to a lakhpati, crorepati? Doesn’t it gel very well with your idea of the marital “contract”?

Am I stretching the canvas too wide? Okay, then let’s stick to rapes and gangrapes. Surely these crimes have something to do with the place of women in our sanskriti, samaj. What about the frequent rapes and the parading naked of dalit women across India/Bharat? Or the gangrape of Muslim women (before being flung into flames) in Naroda Patia (and elsewhere in Gujarat in 2002) under the watchful eyes of then BJP MLA Dr Maya Kodnani and the active participation of Bajrang Dal leader Babu Bajrangi? I do not recall a single statement from any leader of the Sangh Parivar in the last 11 years denouncing such monstrous conduct as being foreign to our sanskar? Do you, Bhagwat Ji? And what about the uncle who a week ago was accused of raping his two-year-old niece? He could be from anywhere but this particular uncle was from Gujarat.

So much for “our values”. As to “their values”, first, which Western country should we talk about? The US, with 28.6 rape incidents per 1,00,000 population, or Canada with a far lower 1.4 incidents per 1,00,000 population? (Source: UN Survey of Crime Trends, 2006) Second, while it is no one’s case that rapes do not occur in the West, when will we stop pretending that sexual violence against women is something we have learnt from them?

Patriarchy, no doubt, is the common inheritance of men and women across the globe, but, Bhagwat Ji, there is a big difference. Thanks to a strong feminist movement that took birth in the West some 50 years ago, incidents of rape notwithstanding, in large measure women have fought and won for themselves the right to dress as they like and go where they want, the moon included. The Western male has been forced to give women respect and concede their right to the public space to an extent that we cannot even begin to imagine. That’s what women in India are now demanding and parampara-be-damned is their slogan. What shall we do?

Young couples locked in a tight embrace, lip-to-lip, hip-to-hip, inside buses and metro stations, public parks and shopping malls. This is a common sight today in Paris, London, Amsterdam, New York and elsewhere and not many seem to have a problem with that. The “dented, painted” women locked in such togetherness are often dressed in ways — mini-skirts, hot pants — that defy all our notions of maryada. Whether this flaunting of sexual passion in the public space is a good thing or not can be debated. But one thing is for sure: girls and women are not pinched, groped, pounced upon or mauled in buses, trains and parks in the West the way they are in Mumbai, Delhi.

I believe we need more, not less, infusion of certain Western values — respect for women’s autonomy, for example — in India. Bhagwat Ji, what do you think?

इण्डिया से खफा संघी भारतवंशियों की व्यथा कथा !

संघ प्रमुख मोहन भागवत की दिल्ली गैंगरेप केस पर बयानबाजी का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है तो भाजपा भी अपने वास्तविक मुखिया के बचाव में उतरने में कोई कोर कसर नहीं रख रही है। असल में दिल्ली की इस दर्दनाक घटना ने संघ और भाजपा की परम्परागत मर्दवादी फासीवादी सोच को दुनिया के सामने उजागर कर दिया है। हालाँकि इसे एक बड़ी विडंबना ही कहा जायेगा कि जब सारा देश महिलाओं की सुरक्षा और उनके खिलाफ बढ़ती हिंसा को लेकर चिंतित है तो वहीं सुबह से देश के अधिकतर पार्को में कब्जा जमा लेने वाले इन अर्धनग्न वर्दीधारियों की यह जमात पूरे मुद्दे को इंडिया और भारत के बेतुके विवाद में फंसा देना चाहती है। इस रूढ़ मानसिकता के यह स्वयम्भू मसीहा औरतों की मर्यादा की तो तमाम लक्ष्मण रेखाएँ खींचना चाहते हैं परन्तु अपने पुरुष दिमाग की वासनात्मक बीमारियों और विक्षप्तता पर कुछ नहीं कहना चाहते हैं। यह इनके साम्प्रदायिक संस्कारों की गूँज है जो देश की एक मासूम बेटी के घिनौने कत्ल पर भी अपनी बीमार मानसिकता दिखाने से बाज़ नहीं आ रही है।

वैसे यह पहली बार नहीं है जब इन्होंने अपना यह रंग दिखाया है। याद करके बतायेंविधानसभा में चलते सत्र के दौरांन कौन लोग थे जो मोबाइल पर पोर्न फिल्म देखते पकड़े गए सोचिये, जो लोग चलते सत्र के दौरान लोकतंत्र के मंदिर में बैठकर इतनी करतूत कर सकते हैं, वह बंद कमरों या घरों में क्या गुल खिलाते होंगे। वास्तव में औरत को दोयम दर्जे की बनाकर रखना ही इनकी वैचारिक विरासत है। अभी हाल ही में श्रीमन भागवत का दूसरा ब्यान बताता है कि औरतों का काम आदमी की सेवा करना है और आदमी का काम औरात को पालना है और औरत यदि अपने काम को सही से पूरा नहीं कर पाती है तो आदमी उसे छोड़ सकता है। और इसे श्रीमन भागवत एक सामाजिक समझौता कहते हैं। ऐसा समझौता जिसमें सारे अधिकार आदमी के पास हैं। सेवा करवाने से लेकर रोजाना शारीरिक दुर्वयवहार करने तक। माने कि औरत घर का एक जरूरी और कीमती सामान है जिसे आदमी अपनी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल कर सकता है। और जब चाहे उसे नकारा बताकर छोड़ भी सकता है। सभी धार्मिक ठेकेदारों और धर्म के नाम पर अपनी राजनीतिक दुकान चलाने वालों की तरह ब्राह्मणवादी संघी दुकानदारों की भी यही मानसिकता है। ढोल, शूद्र, नारी सब ताड़न के अधिकारी।
असल में हिन्दू धर्म के यह स्वयंभू संघी ठेकेदार पौराणिक रूप से एकदम ठीक हैं। जब इनका पूजनीय देवता इंद्र एक ऋषि गौतम का वेश धारण करके उनकी पत्नी अहिल्या के साथ बलात्कार करता है और उस बलात्कार की सजा भी बलात्कार का शिकार अहिल्या ही पाती है। इसके बाद अहिल्या की मुक्ति भी राम के पैर से छूने पर ही होती है। उस राम के जिसने ना अपनी पत्नी के साथ न्याय किया न ही शूद्र शम्बूक के साथ। अब राम और इंद्र को पूजनीय मानने वाले उनके अनुयायियों से क्या आशा की जा सकती उनके सपनों का हिन्दुस्तान ही यही है। औरत की अस्मत को लूटने वाले का दोष नहीं बल्कि औरत को दोष और सजा भी औरत को कि गुनाह औरत का है उसने ही लक्ष्मण रेखा लांघी होगी। उस लक्ष्मण को भी कोई दोष नहीं जो माँ समान भाभी को छोड़कर चला गया और भाई के आदेश की भी अवहेलना की। अब युगों युगों से एक बलात्कारी इंद्र को पूजनीय मानने वाली और बलात्कार का शिकार अहिल्या को सजा देने वाली विचारधारा को क्या कहें।

श्रीमन भागवत को ठीक इसी समय उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर की उस घटना की निंदा करना याद नहीं रहा जहा पंचायत ने एक औरत के बलात्कार का 1.50 लाख मुआवजा देने का फरमान सुनाया। दरअसल यही संघी मानसिकता का सच है कि वह देश में ऐसी पंचायतों का ही राज कायम करना चाहती है जहाँ वासना और विष घुले दिमाग औरतों और समाज के वंचित तबकों की अस्मत से खिलवाड़ करते रहें और संघियों की पंचायतें उन पर मुआवजे के कम्बल डालकर उन्हें ढँकती रहें। वैसे इनका इतिहास ऐसी ही घटनाओं और करतूतों का इतिहास है। इनके दो गुजराती शूरवीर बाबू बजरंगी और माया कोडनानी इनके ऐसे ही दो ऐतिहासिक पात्र हैं। जिनको बचाने के लिए संघ और भाजपा ने धरती आसमान एक कर दिया। गुजरात नरसंहार में इन दोनों शूरवीरो पर संघी इतना आत्ममुग्ध हुए कि माया कोडनानी को तो इन्होने मंत्री ही बना डाला। गैंगरेप केस में चीख चीखकर गुनाहगारों फांसी की मांग करने वाली इनकी महिला नेत्रियाँ सुषमा से लेकर स्मृति, शाइना तक सभी खामोश थीं और खामोश रहेंगी क्योंकि बाबू बजरंगी, माया कोडनानी और दारा सिंह ही इनके असली हीरो है। ये औरतें कम और लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा कुर्सियों की चाह अधिक हैं।
अब श्रीमन भागवत की व्यथा को समझा जाना चाहिए दिल्ली गैंगरेप केस के अभियुक्तों में संघी हीरो बनने की आपार क्षमताएं छुपी हैं और इंडिया वाले हैं कि उन्हें फाँसी टांगने पर तुले हैं। अब यह जघन्य काण्ड हुआ भी दिल्ली में है जहां की पुलिस बेशक भ्रष्ट हो निक्क्म्मी हो उसमें गुजरात पुलिस जितनी अपने सहयोगियों और नायकों को बचाने की योग्यता नहीं है। 

यदि यहाँ संघ की राजनीतिक शाखा भाजपा या मोदी का राज होता तो नतीजे कुछ और ही होते और श्रीमन भागवत अपने संभावित नायकों को बचाकर गुजरात अथवा उड़ीसा जैसे काण्ड रचवा पाते। फिर भी भागवत कोशिशों के बारे में यही कहा जा सकता है। जय हो अपराधी हितरक्षकजय हो बलात्कारी ध्वजधारक तेरी जय हो।

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