Tuesday, November 25, 2014

SUSHIL CHANDRA - धर्मनिरपेक्ष दक्षिणपंथ – एक कल्पना का सच

धर्मनिरपेक्ष दक्षिणपंथ – एक कल्पना का सच: सुशील चन्द्र

पिछले जयपुर साहित्योत्सव (हालांकि मैं उसे ‌‌‌तमाशा-ए-अदब कहना अधिक पसंद करूंगा) के दौरान अमर्त्य सेन ने अपनी सात अभिलाषाएं व्यक्त कीं। दिलचस्प यह है कि उनमें से एक अभिलाषा उलटबांसी अधिक नजर आती है – कि वह देश में एक धर्मनिरपेक्ष दक्षिणपंथ चाहते हैं । यह मासूम सी सदिच्छा न सिर्फ कई प्रश्न उठाती है बल्कि एक साथ कई सारी विवेचनाओं की मांग भी करती है। सच तो यह है कि यह कामना कोई नई बात नही है और पश्चिम की अधिकांश दक्षिणपंथी पार्टियां जैसे रिपब्लिकन पार्टी़, कंजरवेटिव पार्टी़, क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी इत्यादि इसी संकल्पना की उपज हैं। वस्तुत: यह संकल्पना इस अवधारणा से निकली है कि दक्षिणपंथ के धार्मिक-सामाजिक पक्ष (जिसकी परिणति कठमुल्लावादी रूढि़वाद में होती है) और आर्थिक पक्ष (जो अंतत: नव रूढि़वाद में प्रतिफलित होता है) बिल्कुल अलग अलग हैं और उनके बीच कोई पारस्परिक निर्भरता नहीं है।
पहली नजर में यह सही भी लगता है जहां फ्रांस में लंबे समय तक दक्षिणपंथी शासन के बावजूद प्रशासन राज्य और धर्म के बीच संपूर्ण अलगाव के प्रति समर्पित नजर आता है। यहां तक कि भारत में भी न सिर्फ स्वतंत्र पार्टी बल्कि मनमोहन सिंह सरकार भी अपने सारे नवउदारवादी आग्रहों के बावजूद धार्मिक रूढि़यों से मुक्त नजर आती थी। मैंने जानबूझ कर नजर आती शब्दों का इस्तेमाल किया है क्योंकि सचमुच ऐसा है या नहीं इसकी जांच अभी बाकी है। लेकिन इसके पहले कि हम इस बिंदु की पड़ताल करें, इन दो बहुचर्चित शब्दों ‍- वामपंथ और दक्षिणपंथ को समझना जरूरी है । जरूरी इसलिए है कि इन दो शब्दों का अर्थ संदर्भ के साथ बदलता जाता है ।
अमेरिकी संदर्भ में ओबामा और क्लिंटन वामपंथी हैं जबकि वे अपने आपको समाजवादी तक कहलाना पसंद नहीं करते । शावेज चर्च में पूरी आस्था रखते हुए भी धुर वामपंथी माने जाते हैं। वहीं सोवियत चीन विवाद के दौरान माओ त्से तुंग ख्रुश्चेव तक को दक्षिणपंथी मानते थे। और तो और भारत में संघ परिवार और कार्पोरेट जगत उस नेहरू को वामपंथ का अवतार माने बैठा है जिन्होंने केरल की वामपंथी सरकार को बर्खास्त करने में एक मिनट नहीं लगाया। वही नेहरू जिनके लिए बाबा नागार्जुन ने लिखा – “आओ रानी हम ढोएंगे पालकी यही हुई है राय जवाहरलाल की”। सारांश यह कि एक सार्वभौमिक परिभाषा जरूरी है जो इन दोनो शब्दों के लिए हर संदर्भ पर खरी उतरे। और इस सार्वभौमिक परिभाषा के लिए इन शब्दों के उद्गम तक पहुंचना जरूरी है. यदि यह उद्गम बिंदु हम मार्क्स एंगेल्स से मानें तो ये दोनो शब्द साम्यवाद एवं पूंजीवाद से संबंध रखते हैं। लेकिन यदि यह विंदु हम फ्रांसीसी क्रांति को माने तो अर्थ कुछ और निकलता है। लेकिन सच तो यह है कि सच को देखने के इन नजरियों का फर्क मानव चेतना की शुरुआत से ही नजर आता है। भारतीय दर्शन की शुरुआत में वेदों और उपनिषदों में जहां मंत्रों, ब्राह्मणों और संहिताओं का भ्रमजाल नजर आता है वहीं बुद्ध धर्मकीर्ति और दिंनाग के ‌‌‌ द्वारा सच की आंखों में आंखें डालकर देखने का साहस भी। यूनानी दर्शन में तो यह फर्क और साफ नजर आता है और अरस्तू़, अफलातून और सुकरात के बरक्स पाइथागोरस दिमाक्रितस इत्यादि भौतिकवादी चिंतकों की पूरी श्रृंखला नजर आती है। इसलिए उद्गम बिंदु ढुंढने का यह मामला जटिल भी है और दुष्कर भी।
इसलिए मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि फ्रांसीसी क्रांति इस परिभाषा के लिए सबसे उपयुक्त आधार प्रदान करती है। स्वतंत्रता़, समता और बंधुत्व वामपंधी चिंतन को ऐसी ही सार्वभौमिक परिभाषा प्रदान करते हैं जो हर संदर्भ पर खरी उतरे। दक्षिणपंथ यूं तो वामपंथ का विलोम है लेकिन उसे गुलामी़, गैरबराबरी और शत्रुत्व जैसे शब्दों से परिभाषित करना इस शब्द के प्रति अन्याय होगा। दरअसल आज तक किसी भी दक्षिणपंथी चिंतक या प्रशासन ने स्वतंत्रता समता और बंधुत्व के आदर्श को खुले तौर पर खारिज नहीं किया है।  लेकिन यह कसौटी तब खुलकर सामने आती है जब सवाल प्राथमिकताओं का आता है और दक्षिणपंथ की प्राथमिकताएं अलग हैं। और ये प्राथमिकताएं सरसरी नजर डालने से ही सामने आ जातीं हैं । अल-काएदा से बोस्टन टी पार्टी तक और बजरंग दल से फ्रांस की नेशनल पार्टी तक सबकी प्राथमिकताएं एक ही हैं ‍– धर्म, संस्कृति और परंपरा। ऐसा नहीं कि वामपंथ को इन शब्दों से कोई चिढ़ है। लेकिन वामपंथ और दक्षिणपंथ का फर्क तब सामने आता है जब इन शब्द समूहों के बीच चुनाव का सवाल खड़ा होता है। एक दक्षिणपंथी के लिए स्वतंत्रता़, समता और बंधुत्व वांछनीय हैं लेकिन तभी तक जब तक धर्म, संस्कृति और परंपरा से समझौता नहीं करना पड़े। इसी तरह वामपंथ संस्कृति और परंपरा यहां तक कि धर्म का भी सम्मान करता है लेकिन स्वतंत्रता समता और बंधुत्व की कीमत पर नहीं।
लेकिन एक सवाल फिर भी रह जाता है । धर्म, संस्कृति और परंपरा की दक्षिणपंथ की इस परिभाषा के बीच यहां आर्थिक सोच कहां है । धर्म की व्यापक अवधारणा को गौर से देखने पर स्पष्ट होता है कि यथास्थितिवादी जीवन मूल्यों का पोषण ही धर्म की शक्ल लेता है ।एक गीत में साहिर ने बड़े सुन्दर शब्दों में इसे व्यक्त किया है‍ – “ ये पाप है क्या ये पुण्य है क्या़ रीतों पर धर्म की मुहरें हैं”। और यथास्थितिवादी जीवन मूल्यों का तात्पर्य यहां स्पष्ट रूप से सामंती और पूंजीवादी जीवनमूल्यों से हैl राजभक्ति़, स्वामिभक्ति़, विप्रभक्ति आदि सारे जीवनमूल्य इसी शोषणमूलक व्यवस्था की उपज हैं जिसके केन्द्र में पैसे का श्रम के ऊपर और सशक्त का अशक्त के ऊपर स्वामित्व ईश्वरीय आदेश है। वंचितों के प्रभुत्वशालियों के प्रति क्या कर्तव्य हैं और प्रभुत्वशालियों के वंचितों के ऊपर क्या अधिकार हैं, यही सारे धर्मों का सारांश है और फलतः यही दक्षिणपंथी आर्थिक सोच का केन्द्र है। आज के नव रूढि़वादी दक्षिणपंथ को यदि पूंजीवादी जनतंत्र के संदर्भ में पारिभाषित करें तो इसका अर्थ दो सूत्रों से निकलता है – न्यूनतम सब्सिडी़, न्यूनतम कर तथा नीति नियमन प्रक्रिया के ऊपर कॉरपोरेट का संपूर्ण नियंत्रण। मिसाल के लिए भूमि अधिग्रहण कानूऩ, श्रम कानूऩ, वन अधिकार कानून आदि सारे कानूनों का कॉरपोरेट हित में सरलीकरण आज नव रूढि़वादी अर्थतंत्र का सबसे प्रिय एजेंडा है। निष्कर्ष यह है कि दक्षिणपंथी अर्थतंत्र की जड़ें धर्म से ही निकलतीं हैं।...