Saturday, June 18, 2016

अपूर्वानंद - शिक्षण की हालत ऐसी इसलिए भी है क्योंकि हम शिक्षक ऐसे हैं

इस किस्से को दुहराना इसलिए ज़रूरी है कि अध्यापक वर्ग खुद यह सोच पाए कि उसने अपनी आज़ादी खुद ही कैसे गंवा दी है. कुलपति हों, या विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष या उसकी समतियों के सदस्य, सभी अध्यापक ही होते हैं... सरकार बदलते ही आयोग पूरी तरह बदल गया. उसी अध्यक्ष ने उसी कुलपति को कारण बताओ नोटिस जारी किया. उस पर आरोप लगाया कि उसने प्रक्रिया का उल्लंघन किया है.
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सुनते हैं, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने कॉलेज और विश्वविद्यालय के शिक्षकों का कार्यभार बढ़ाने संबंधी अपना आदेश वापस ले लिया है. उसने शिक्षकों की प्रोन्नति के लिए जारी किया गए एकेडेमिक परफोर्मेंस इंडेक्स में भी बदलाव की सूचना दी है. अखबारों की खबर के मुताबिक़ उसने इस परिवर्तन की सूचना सरकार को दे दी है.

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अपना निर्णय अभी कुछ समय पहले ही लिया था. इसके खिलाफ शिक्षक जब बड़ी संख्या में सड़क पर उतर आए तब सरकार के लिए उनके विरोध को नज़रअंदाज करना मुश्किल हो गया. कहा जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी से जुड़ा शिक्षकों का एक प्रतिनिधिमंडल मानव संसाधन मंत्रालय से मिला और वहीं इसका फैसला किया गया. आयोग ने मात्र उस फैसले को अमली जामा पहनाने का काम किया. सरकार के आदेश पर वह आपत्ति कर सकता है, यह तो सोचा ही नहीं जा सकता.

इस खबर से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ. आयोग ने अरसा हुआ, अपनी स्वायत्त भूमिका के बारे में सोचना ही छोड़ दिया है. उसके निर्णय किसी स्वायत्त अकामदिक प्रक्रिया से अकादमिक मस्तिष्क द्वारा लिए गए निर्णय नहीं रह गए हैं. तकरीबन चार वर्ष पहले काकीनाड़ा(आंध्र प्रदेश)में एक इंजीनियरिंग कॉलेज में शिक्षा से जुड़े एक केंद्र की स्थापना को लेकर बहस छिड़ी थी. आयोग के सदस्य इसे अतार्किक बता रहे थे कि शिक्षा पर एक अन्तरविश्वविद्यालयीय केंद्र ऐसी जगह स्थापित हो जहां उसकी कोई परंपरा और विशेषज्ञता न हो. तब उन्हें कहा गया कि आप यदि इसके खिलाफ निर्णय करेंगे तो सरकार अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए आपके निर्णय को उलट देगी. यही हुआ भी.

इस अपमान के बाद भी आयोग इस तरह काम करता रहा, जैसे कुछ हुआ ही न हो. उसी तरह, दिल्ली विश्वविद्यालय के चार वर्षीय पाठ्यक्रम के पूरे विवाद में आयोग की भूमिका बहुत ही दयनीय रही. पहले तो उसने बढ़-चढ़कर इस पाठ्यक्रम का समर्थन किया. यह कुछ इतना उत्साही समर्थन था कि आयोग के अध्यक्ष ने दिल्ली विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति के प्रति सार्वजनिक तौर पर अपना समर्थन जाहिर करने के लिए उनसे एक बहुत ही निजी रिश्ता बताया. उन्होंने कहा कि वे उनसे (यानी, कुलपति से) जितना प्यार करते हैं उससे ज़्यादा सिर्फ उनकी पत्नी (कुलपति की) ही करती होंगी. आगे बढ़कर उन्होंने यह भी कहा कि इस पाठ्यक्रम को पूरे देश में लागू किया जा सकता है. उस समय आयोग ने शिक्षकों और छात्रों के ऐतराज को कोई तवज्जो न दी.

सरकार बदलते ही आयोग पूरी तरह बदल गया. उसी अध्यक्ष ने उसी कुलपति को कारण बताओ नोटिस जारी किया. उस पर आरोप लगाया कि उसने प्रक्रिया का उल्लंघन किया है. अंत में यब धमकी भी दी कि दिल्ली विश्वविद्यलाय अपने इस पाठ्यक्रम को, जोकि गैर कानूनी है, वापस ले वरना उसकी मान्यता समाप्त कर दी जाएगी.

तत्कालीन कुलपति ने आज्ञाकारी बालक की तरह उस कार्यक्रम को वापस ले लिया, जिसे उन्होंने अपना एक क्रांतिकारी, युगांतरकारी कदम बताया था और जो अकादमिक से ज़्यादा उनकी इज्ज़त का मामला बन गया था. आनन-फानन में वे विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद के समक्ष इस पाठ्यक्रम को वापस करने संबंधी प्रस्ताव ले आए. यह भी शोचनीय है कि उसी परिषद् ने इस प्रस्ताव को बिना विचार किए पारित किया, जिसने कोई एक साल पहले चार साल का पाठ्यक्रम लागू किया था. वे ही अध्यक्ष, वे ही डीन थे, जिन्होंने पिछले पाठ्यक्रम के पक्ष में लम्बे बयान दिए थे.

अपने ही निर्णय को धमकी मिलने के बाद बदलने में किसी ने पलक भी नहीं झपकाई और बाद में उनके चेहरे पर झेंप के निशान तक न थे. कुलपति भी इस बेइज्जती को आराम से पी गए जैसे ब्रह्मांड के हित के लिए शिव ने विष पिया हो. उसके बाद साल भर से भी अधिक वे अपने पद पर अपना तेजोवलय खो कर बने रहे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारकों की अगवानी करते रहे.
इस किस्से को दुहराना इसलिए ज़रूरी है कि अध्यापक वर्ग खुद यह सोच पाए कि उसने अपनी आज़ादी खुद ही कैसे गंवा दी है. कुलपति हों, या विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष या उसकी समतियों के सदस्य, सभी अध्यापक ही होते हैं. वे अपने निर्णय कैसे और क्यों लेते हैं?
कायदे से चार वर्षीय पाठ्यक्रम के कांड के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में इसे लेकर विचार-विमर्श और आत्ममंथन चलना चाहिए था. शिक्षकों के उस बड़े समूह को इसके बारे में कोई सार्वजनिक बयान देना चाहिए था जो पहले इसके पक्ष में कुलपति के साथ पेश-पेश था और जिसने इस कार्यक्रम की आलोचना या विरोध को तरह-तरह से लांछित किया था. उसे इसके बारे में भी कुछ सोचना चाहिए था कि उस वक्त के विरोधी अध्यापकों को वेतन काटने से लेकर प्रोन्नति रोकने तक से दंडित किया गया तो वह न सिर्फ चुप था बल्कि इसमें भागीदार भी था.

लेकिन कोई आत्मनिरीक्षण न हुआ. हर कोई धूल झाड़कर यों उठ खड़ा हुआ जैसे खेल में पीठ जमीन से लगती ही है. उसी का परिणाम हम आज भुगत रहे हैं. शिक्षक नाम की सत्ता के क्षरण में सरकारों की भूमिका से किसे इनकार है? लेकिन क्या वह जब कॉलेज या विश्विद्यालय स्तर पर हो, तभी हम हिलेंगे? सरकार ने विद्यांजलि नामक योजना में इसका प्रावधान किया है कि हर इच्छुक व्यक्ति अब स्कूल में पढ़ा सकेगा. इस एक निर्णय से स्कूली शिक्षक की पहचान ही ख़त्म कर दी गई है. लेकिन इस पर विश्वविद्यालय के शिक्षकों की कोई सामूहिक प्रतिक्रिया नहीं देखी गई.

अगर इसे छोड़ दें तो भी बरसों से भारत के प्रत्येक राज्य में धीरे-धीरे कॉलेजों के शिक्षकों के पद समाप्त कर दिए गए, उन्हें अस्थायी बना दिया गया और एक मुश्त पन्द्रहबीस हजार रुपयों पर बहालियां की जाने लगीं. लेकिन केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के आध्यापकों की और से इसका कोई संज्ञान लिया गया हो, इसके प्रमाण नहीं.
स्कूलों में विद्या सहायक या गुरुजी जैसे अर्ध-शिक्षक हों या कॉलेजों में एकमुश्त भुगतान पर बहाल अस्थायी शिक्षक हों, देश में ऐसा वातावरण बना दिया गया है कि अब किसी को यह सुनकर कोई हैरानी नहीं होती कि कॉलेज में एक शिक्षक को चौबीस घंटे पढ़ाने को कहा जा रहा है, बल्कि वह चकित इस बात पर होता है कि इसका विरोध शिक्षक क्यों कर रहे हैं!

शिक्षण और शोध को एक-दूसरे से अलग करने के कारण भी एक बड़ा तबका ऐसे शिक्षकों का तैयार हो गया जिनकी आत्मछवि को तोड़ देना आसान था. शोध या प्रकाशन चंद संस्थानों से जुड़े अध्यापकों का विशेषाधिकार हो गया. इसके साथ ही इस पर भी विचार करने की ज़रूरत है कि शोध कार्य को आर्थिक सहायता देने की प्रक्रिया कैसी है और किसका हित साधन वह करती है!

ये सारे सवाल शिक्षकों की स्वायत्तता और उनके पेशे की पहचान से जुड़े हैं. इनपर अगर हमने अब भी ठहर कर विचार नहीं किया और सरकारी दबाव में आयोग के अपने फैसले को पलट देने के बाद राहत की सांस लेकर अपने धंधे में लग गए तो आगे के बड़े हमलों का सामना हम नहीं कर पाएंगे. आयोग ने अपनी साख तो पूरी तरह गंवा ही दी है. स्वच्छता अभियान हो या सरदार पटेल जयंती या कोई और सरकारी कार्यक्रम, हर मौके पर वह जैसे बढ़-चढ़कर फरमान जारी करता रहा है, उससे उसके ज्ञान से जुड़ी संस्था होने पर ही सवाल खड़े हो गए हैं. वह एक किस्म का डाकखाना हो गया है जो सरकारी आदेश को शिक्षकों तक पहुंचाता भर है. आज मौक़ा है कि हम इस संकट को इसके हर पहलू के संदर्भ में समझने की और इसमें अपनी भागीदारी की समीक्षा की शुरुआत करें.